कैसे करूंँ पश्चाताप ?
हर कण में है ग्लानी की छाप।
कुछ नादान था कुछ अभिमान,
जब नहीं किया था आपका सम्मान।
कल था आप के प्रतिकूल ,
आज हूंँ आपके अनुकूल ।
कृपादृष्टि आपकी, योगदान आपका ।
एक दिन मंजिल पाएगा शिष्य आपका।।
आहोश में था उस रोज मैं।
पश्चाताप के आंँसुओं से आज फिर रोया हूं मैं।।
जब मैंने बात का उल्लंघन किया होगा!
आत्मा में कैसा मंथन हुआ होगा ?
भूल गया था कर्तव्य,
शायद इसीलिए नहीं पहुंच पाया गंतव्य।
तेवर भी छूट गए दुनियादारी भी छोड़ दी।
खुद को ना बदल सका पर सोच ही बदल ।।
मार्ग भटका, फिर अटका !
अभिमान रूपी फूटा मेरा मेरा मटका।
जो पथ दिखाया आपने ,
वह आज भी याद है ।
प्रतिपल प्रतिक्षण अनुसरण करूं
यही रब से फरियाद है ।।
आज भी देखता हूंँ सपनें नैयनो के आकाश में।
रहमत है आपकी मुझ पर ,
तभी तो हूं फर्श से अर्श पर।।
मैं मूर्ख था ,मैं धूर्त था।
मुझे एहसास हुआ, आभास हुआ।
जब परखने का प्रयास किया
मेहरबानियांँ आपकी, कदरदानियांँ आपकी।
करुणा भी याद है महिमा भी याद है आपकी।।
जो दिया जलाया आपने,
उसे कौन सी बयार बुझाएगी ?
भाग्य ही बदल दिया आपने,
कौन सी हस्तरेखा रोक पाएगी?
कुमार देवेंद्र
'सितार ए हिन्द'
द्वारा स्वरचित मौलिक रचना प्रिय शिक्षक को समर्पित।