सोचता हूं लिख दूँ,
क्या बताऊं मैं कैसे लिखूंँ ?
जब सब कुछ मैंने भुला दिया।
खुशी के उन लम्हों को,
गम में मैंने मिला दिया।।
तेरे इश्क में जीता मरता हूंँ।
बेवफाई का इतिहास पढ़कर,
रो रोकर भी हँसता हूँ।।
तुझे पाना मेरी मंजिल है।
आज भी ख्वाहिश रखता हूंँ।
अभी तक खामोश था,
आशिकी का गम पीकर ।
अब तक मदहोश था।
तेरे संग बिताए लम्हों की,
यादों में जीता हूं।
इतना खुश होकर भी,
गम के अश्क मैं पीता हूँ।
अपनों के लिए मैं ठहर गया।
सपनों के खातिर सुधर गया।।
अपने कुछ बारे में।
ऐसी कैप्शन न लिखी होगी।
किसी शायर ने जमाने में।।
लिखता हूंँ इस अंदाज से,
तेरे उस मिजाज से।
तेरी झूठी बातें लिखकर।
मेरी कलम तंग हो गई।
ना जाने भावुक होकर,
ऐसी बातें कैसे लिख दीं।
उसकी विवशता को देख कर।
आज प्रेरित हो गया हूं।
उसकी खामोशी भी सुन लिया था,
इसलिए आज चुप हो गया हूंँ।।
क्या बताऊं मैं कैसे लिखूंँ ?
जब सब कुछ मैंने भुला दिया।
खुशी के उन लम्हों को,
गम में मैंने मिला दिया।।
तेरे इश्क में जीता मरता हूंँ।
बेवफाई का इतिहास पढ़कर,
रो रोकर भी हँसता हूँ।।
तुझे पाना मेरी मंजिल है।
आज भी ख्वाहिश रखता हूंँ।
अभी तक खामोश था,
आशिकी का गम पीकर ।
अब तक मदहोश था।
तेरे संग बिताए लम्हों की,
यादों में जीता हूं।
इतना खुश होकर भी,
गम के अश्क मैं पीता हूँ।
अपनों के लिए मैं ठहर गया।
सपनों के खातिर सुधर गया।।